अपठित गद्यांश -14
लोकमान्य तिलक अंग्रेजों द्वारा बन्दी बनाए गए थे। उन्होंने जेल में अपने आपको अध्ययन में व्यस्त रखा। जेल बहुत ही शान्त जगह थी, जहाँ पक्षी भी नहीं चहचहाते थे। तिलक ने अपने भोजन में से आपका खाना पक्षियों के लिए रखना शुरू कर दिया। आरम्भ में तो किसी ने वह खाना छुआ नहीं, किन्तु कुछ दिन बाद थोड़े-से पक्षियों ने यहाँ आना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे उनकी संख्या बढ़ती गई और वे तिलक के चारों तरफ इकट्ठे होने लग गए। पक्षी उनके सिर पर, कन्धों पर निडर होकर बैठ जाते थे। एक दिन गश्त लगाते हुए जेलर तिलक की कोठरी की ओर आए। पक्षियों की चहचहाहट सुनकर उन्होंने कोठरी में झाँका और पूर्णतया आश्चर्यचकित रह गए। "इतने सारे पक्षी। ये कहाँ से आ गए है?” उसने पूछा। तिलक ने उत्तर दिया, "मित्र में इन्हें भारत से नहीं लाया। ये यहाँ से ही आए है।" जेलर आश्चर्यचकित रह गया। उसने कहा, "यहाँ तो हर कोई पक्षियों को खा जाता है. इसलिए पक्षी इस ओर नहीं आते हैं।" तिलक हँसकर बोले, "पक्षी भी मित्र और शत्रु में भेद कर सकते हैं।"
- तिलक जेल में अपना समय कैसे व्यतीत करते थे?